(रिपोर्ट: प्रताप) मुजफ्फरनगर। मकर संक्रांति के पावन पर्व पर, जब सूर्य उत्तरायण होकर प्रकृति में गर्माहट लाता है, ठीक उसी समय बुढ़ाना कोतवाली में थाना प्रभारी (SHO) सुभाष बाबू अत्री के संवेदनशील हृदय की ऊष्मा ने सैकड़ों ठिठुरते चेहरों पर मुस्कान बिखेरी। हाड़ कँपा देने वाली शीतलहर और भीषण पाले के बीच, अत्री जी ने थाना परिसर में अभावग्रस्त और बेसहारा बुजुर्गों को कंबल वितरित कर मानवता का वह अनुपम अध्याय लिखा, जिसकी गूँज समूचे क्षेत्र में आत्मिक शांति पहुँचा रही है। समदर्शिता और न्याय का जीवंत पर्याय इंस्पेक्टर सुभाष बाबू अत्री का व्यक्तित्व उस वटवृक्ष के समान है जिसकी शीतल छाया में हर पीड़ित को न्याय की अनुभूति होती है। क्षेत्र में उनकी ख्याति एक ऐसे ‘न्याय पुरुष’ के रूप में है, जिनके समक्ष शासन का कोई रसूखदार व्यक्ति हो या समाज का सबसे विपन्न आम जन—सबकी सुनवाई एक समान धरातल पर होती है। उनकी समदर्शिता और बिना किसी भेदभाव के सबकी व्यथा सुनने की सहजता ने पुलिस की छवि को जन-मानस के हृदय में एक रक्षक और हमदर्द के रूप में स्थापित कर दिया है। अश्रुपूरित नयनों ने दिया आशीष: खाकी का दिव्य स्वरूप वितरण के दौरान जब थाना प्रभारी ने अपने कर-कमलों से निस्सहायों के कंधों पर सुरक्षा और सेवा की चादर (कंबल) ओढ़ाई, तो दृश्य अत्यंत मर्मांतक और भावुक हो उठा। एक ओर प्रशासन की दृढ़ता और दूसरी ओर हृदय की कोमलता का यह अद्भुत संगम देख हर कोई गदगद था। एक बार फिर यह सप्रमाण सिद्ध हुआ कि “अनुशासन की सख्त वर्दी के भीतर एक करुणा से ओत-प्रोत हृदय वास करता है।” जब अभाव में जी रहे बुजुर्गों के अश्रुपूरित नयनों ने उन्हें आशीष दिया, तो वह क्षण खाकी के देवदूत स्वरूप का साक्षात प्रमाण बन गया। पुलिस की इसी निस्वार्थ परोपकारिता और समदर्शिता को समर्पित यह श्लोक: अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥





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