कब होगा होली दहन? जानिये ज्योतिषाचार्य पंडित विनय शर्मा से!
मुजफ्फरनगर में सिविल लाईन थाने के सामने प्रसिद्ध धार्मिक संस्थान विष्णुलोक के संचालक पं0 विनय शर्मा ने बताया कि इस वर्ष 02 मार्च 2026 दिन सोमवार को होली का पावन पर्व है। 2 मार्च 2026 को फाल्गुनी पूर्णिमा सायं 5 बजकर 56 मिनट से प्रारम्भ हो रही है जो कि 3 मार्च 2026 को सायं 5 बजकर 7 मिनट तक रहेगी। शास्त्रों मे उल्लेख है कि फाल्गुनी पूर्णिमा में ही होलिका दहन किया जाता है। लेकिन इस बार पूर्णिमा शुरू होते ही भद्रा लग जायेगी। 2 मार्च 2026 को भद्रा सायं 5 बजकर 56 मिनट से प्रारम्भ होकर 3 मार्च 2026 को प्रातः 5 बजकर 28 मिनट तक रहेगी। भद्रा भगवान सूर्यदेव की पुत्री और शनिदेव की बहन है। भद्रा स्वभाव बहुत ही कड़क होता है। 2 मार्च 2026 को यदि होलिका पूजन प्रातः 9 बजे से दोपहर 12ः24 के बीच किया जाए तो विशेष फलदायी रहेगा और 2 मार्च 2026 को होलिका दहन अर्द्धरात्रि 12 बजकर 50 मिनट से 2 बजे के बीच भद्रापूच्छ काल में किया जाए तो अत्यन्त श्रेष्ठ एवं लाभदायक रहेगा।
पितृशान्ति एवं सुख समृद्धि हेतु मनोकामना पूर्ति के लिए हर्षाेलास से भरा पावन पर्व होली एक धार्मिक एवं सामाजिक पर्व है। यह पर्व तांत्रिको के लिए भी विशेष पर्व है। भक्त प्रहलाद से तो इसका सम्बन्ध जोडा जाता है। लेकिन इस पर्व का काम दहन से भी विशेष सम्बन्ध है। क्यांकि भगवान शंकर ने इसी दिन कामदेव को भस्म किया था। इसी दिन मनु भगवान की भी पूजा की जाती है। होली उत्सव मनाने से पापो को नाश होता है और मनोकामना पूर्ण होती है। 4 मार्च 2026 को रंगो की होली खेली जायेगी।
2 मार्च 2026 को अर्द्धरात्रि 12ः 50 से 2 बजे के बीच भद्रापूंछ काल में होलिका दहन पं0 विनय शर्मा ने बताया कि खेतो में से नयी गेंहू की बाल लाकर होलिका अग्नि में उसे भुनकर उसके दाने बांटकर खाये जाते है इस अन्न को होला कहते है। जलती होली की परिक्रमा करने से हमारे शरीर में कम से कम 140 फॉरेनहाइट गर्मी प्रविष्ट हो जाती है और शरीर की उस गर्मी से शरीर रोग उत्पन्न करने वाले जीवाणु नष्ट हो जाते है। फाल्गुनी पूर्णिमा वाले दिन डिंडौले मे झूलते हुए भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन से बैंकुठलोक की प्राप्ति होती है।
पं0 विनय शर्मा ने बताया कि पितृ शान्ति, अनेकों रोग- शोक, टोने- टोटको के निवारण के लिए बाजार से एक सूखा खाने वाला तेल वाला गोला लाए और उसे ऊपर से काटकर उसमें तिल भर ले। तिल भरने के उपरान्त गोले के कटे हुए टुकडे को पुनः गोले पर रखकर कलावा बांध दे और इस गोले को नदी में बहा दे तथा पीछे से एक चॉंदी का सर्प भी कहा दे और चुपचाप घर वापस आ जाये।
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